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प्रार्थना खूब लम्बी हो यह जरूरी नहीं. प्रार्थना के शब्द सुंदर हों यह आवश्यक नहीं. भाषा अलंकार पूर्ण हो यह भी आवश्यक नही और भाव सुसंगत हो यह भी आवश्यक नहीं. भगवान् न प्रार्थना की लम्बाई देखते हैं न भाषा का सौंदर्य देखते हैं, और न भावों की सुसंगति ही देखते हैं. भगवान् तो भावना के भूखे हैं. वह तो ह्रदय की निष्कपटता, सरलता तथा शुद्धता पर मुग्ध होते हैं.
अर्थात भगवान् सिर्फ़ ह्रदय की सच्ची भावना के बिना निर्जिव प्रार्थना में ह्रदय की भाषा सुनते हैं. यदि ह्रदय गूँगा है तो भगवान् भी निश्चय से बहरा होगा. सुंदर शब्द से सजी प्रार्थना में भी ह्रदय हो शब्द न हों यह अच्छा है अपेक्षा शब्द हों पर ह्रदय न हो. प्रभात में, प्रार्थना प्रभु की कृपा तथा आशीर्वादों के खजाने को खोलने की कुंजी है, सांयकाल में, प्रार्थना प्रभु की संरक्षा तथा सुरक्षा में बंद होने की कुंजी है. कभी न सोचो, कि प्रभु का विलम्भ उसकी अस्वीकृति है. सच्ची प्रार्थना से जो कुछ मांगता है वह उससे भी अधिक शुभ वास्तु मिलती है.
प्रार्थना के अनुकूल जीवन ढालने का प्रयास करना हमारा परम कर्तव्य है. अंत में यदि तुम अपनी अन्तरात्मा से सब पापों को जड़ मूल से उखाड़ फेंकना चाहते हो और उनके स्थान पर पुण्यों का आरोपण करना चाहते हो तो प्रार्थना किया करो. क्योंकि प्रार्थना द्बारा ही मनुष्य सनातन गुरु पवित्र प्रभु के स्नेह प्रसाद तथा कृपा को प्राप्त करता है. |

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