मूलचन्द्र ब्रह्म चालीसा
दोहा :
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(१)
जै जै मूलचन्द्र महराजा
करहूँ दया मम राखहुं लाजा
बबा का ध्यान ह्रदय में धरता
मूलचन्द्र का वर्णन करता
प्रयाग जिले में एक है ग्रामा
करछना तहसील में सेमरी नामा
अषाढ़ कृष्ण एकादश गुरुवारा
बीस सौ पन्द्रह में देह को धारा
हनुमत भक्त्त के हिय में सोच न
पिता जी तेरे सुनो त्रिलोचन
जिसके देह से धारे गाता
गुलाबकली थीं तेरी माता
ईश्वर की थी जितनी इक्षा
पाये कक्षा दो तक शिक्षा
एक बार जब किये स्नाना
देख लंगोट अचम्भव माना
कमल दलन पर पड़ा तुषारा
हुआ शरीर में तेरे बुखारा
बाद में निकली बड़की माता
जिसके कारण छोड़े गाता
कृष्ण के पाँव में लगा बाना
यह तो था एक मात्र बहाना
तुझै था ब्रह्म योनी में जाना
करने को जग का कल्याना
मातृ नवमी मास कुआरा
बीस सौ तेईस दिन सोमवारा
देवी के बल पिता ने दाबा
फिर पूजे तू ज्यदाव बाबा
पाँच साल बबा का तप कीन्हा
चौरा पाँच सौ तिरसठ कीन्हा
बारह साल काली को पूजा
साथ में परोपकार भी दूजा
जिस चौरा पर तुझे बुलावें
भूत प्रेत दूर भग जावें
नाम तुम्हार सुनत नर नारी
सबके दूर होत हैं गारी
जैसी करता कोई भक्त्ति
उसको वैसी देते शक्त्ति
जो जन धरै तुम्हारो ध्याना
उनकर होत सदा कल्याना
जो होता श्रुति सन्त विरोधा
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(२)
उन सब पर तू करते हो क्रोधा
धर्म शास्त्र जो शक्त्ति जाना
उन पर आपकी कृपा महाना
कठिन से कठिन काज जग मांही
सुमिरत नाम पूर होई जाई
बाबा जी जो नियम बनाये
सबसे पालन उन्हें कराये
जोउ जन करै नियम का भंगा
उनको करते आप अपंगा
पुत्रहीन जो इक्षा करते
तिनकी सूनी गोद को भरते
दुखियारी के दुख को हरते
उनका सुखमय जीवन करते
आवे जब कोई छलकारी
क्रोध से भ्रूगुटी तने तुम्हारी
होई क्रोध तब अपरम्पारा
छलिया तब होवे जरि क्षारा
तुम्हरी स्तुति बबा को भावे
कहत क्लेश दूर होई जावे
कष्ट पड़े भक्त्तों पर जब जब
होत सहाय आप तुम तब तब
आशा है जनता की सारी
आपको भक्त्ती अधिक पियारी
अपने लोक बबा जब जइहैं
पाँच सौ पैंसठ दुम्हें दिखइहैं
तुम्हरी महिमा सब जग जाना
सब का तू करि हो कल्याना
निर्बल को करते बलवाना
चतुर होहिं आकर अज्ञाना
तेरी महिमा कैसे गाऊँ
जिसका कहीं पार नहिं पाऊँ
जनम जनम तक रइहै नामा
करिहों सब का पुरन कामा
मूलचन्द्र चालीसा जो गावे
सकल विघ्न दूर होई जावे
मन वांछित फल चाहै जोई
करै पठ शत बारइ सोई
गुरुदेव पुजारी तेरे दासा
करहुँ ब्रह्म तुम ह्रदय में वासा |
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